शुक्रवार, 10 मई 2013


आँख की रेत में ---

यही सही है मगर तुमको एतिबार नहीं

ये छत हवा में है नीचे कोई दीवार नहीं

हम इत्मिनान से इस नाव में बैठे तो हैं

हाथ में मांझी के लेकिन कोई पतवार नहीं

थके हैं पाँव और दूर बहुत जाना है

धूप कम होगी कभी, इसके भी आसार नहीं

आँख की रेत में ख्वाबों की नमी क्या होगी

इस तरफ नींद की आती कभी फुहार नहीं

चमन में फूल आदतन ही खिल रहे होंगे

इधर तो भूल के आती कभी बहार नहीं

अगर पढ़ो तो इसे सिर्फ मन की आँखों से

ज़िदगी मेज़ पे रखा कोई अखबार नहीं

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